आइये जाने दो ग्रहों की अंशात्मक युति एवं उनके लाभदायक उपयोग और कार्य तथा ग्रहों के मार्गी और वक्री होने के प्रभाव

आइये जाने दो ग्रहों की अंशात्मक युति एवं उनके लाभदायक उपयोग और कार्य तथा ग्रहों के मार्गी और वक्री होने के प्रभाव ---
जब दो ग्रह एक राशि में एक अंश पर आ जावें तो नजूमी भाषा में उसे ‘नजरे कुरान’ कहते हैं तथा भारतीय ज्योतिषी उसको युति कहकर पुकारते हैं। ऐसी स्थिति में भिन्न-भिन्न ग्रहों का क्या प्रभाव होता है तथा उस समय किस प्रकार के कार्य करने से तांत्रिकों को सफलता मिलती है तथा तंत्रशास्त्र की नजर में उन युतियों का असर जिस प्रकार से माना गया वे इस प्रकार है------
चन्द्र की अन्य गृहों से युति/सम्बन्ध का प्रभाव----
चंद्र+मंगल- शत्रुओं पर एवं ईर्ष्या करने वालों पर, सफलता प्राप्त करने के लिए एवं उच्च वर्ग (सरकारी अधिकारी) विशेषकर सैनिक व शासकीय अधिकारी से मुलाकात करने के लिए उत्तम रहता है।
चंद्र+बुध-धनवान व्यक्ति, उद्योगपति एवं लेखक, सम्पादक व पत्रकार से मिलने या सम्बन्ध बनाने के लिए।
चंद्र+शुक्र-प्रेम-प्रसंगों में सफलता प्राप्त करने एवं प्रेमिका को प्राप्त करने तथा शादी- ब्याह के समस्त कार्यों के लिए, विपरीत लिंगी से कार्य कराने के लिए।
चंद्र+गुरु- अध्ययन कार्य, किसी नई विद्या को सीखने एवं धन और व्यापार उन्नति के लिए।
चंद्र+शनि- शत्रुओं का नाश करने एवं उन्हें हानि पहुंचाने या उन्हें कष्ट पहुंचाने के लिए।
चंद्र+सूर्य- राजपुरूष और उच्च अधिकारी वर्ग के लोगों को हानि या उसे उच्चाटन करने के लिए।
मंगल की अन्य गृहों से युति/सम्बन्ध का प्रभाव----
मंगल+बुध- शत्रुता, भौतिक सामग्री को हानि पहुंचाने, तबाह-बर्बाद, हर प्रकार सम्पत्ति, संस्था व घर को तबाह-बर्बाद करने के लिए।
मंगल+शुक्र- हर प्रकार के कलाकारों (फिल्मी सितारों) में डांस, ड्रामा एवं स्त्री जाति पर प्रभुत्व और सफलता प्राप्त करने के लिए।
मंगल+ गुरु- युद्घ और झगड़े में या कोर्ट केस में, सफलता प्राप्त करने के लिए, शत्रु-पथ पर भी जनमत को अनुकूल बनाने के लिए।
मंगल+शनि- शत्रु नाश एवं शत्रु मृत्यु के लिए एवं किसी स्थान को वीरान करने (उजाड़ने ) के लिए।
बुध की अन्य गृहों से युति/सम्बन्ध का प्रभाव----
बुध+शुक्र- प्रेम-सम्बन्धी सफलता, विद्या प्राप्ति एवं विशेष रूप से संगीत में सफलता के लिए।
बुध+गुरु- पुरुष का पुरुष के साथ प्रेम और मित्रता सम्बन्धों में पूर्ण रूप से सहयोग के लिए एवं हर प्रकार की ज्ञानवृद्घि के लिए नया पाठ, साइन्स सीखने के लिए।
बुध+शनि- कृषि एवं मेवा, सब्जी एवं इसकी वृद्घि के लिए, अच्छी फसल एवं किसी वस्तु की या किसी रहस्य (चोरी या कांड) को गुप्त रखने के लिए।
शुक्र की अन्य गृहों से युति/सम्बन्ध का प्रभाव----
शुक्र+गुरु- प्रेम-सम्बन्धी आकर्षण एवं जनसमूह को अपने अनुकूल करने के लिए।
शुक्र+शनि- स्त्री जाति को हानि, परेशानी, दुर्भाग्य के समस्त कार्य के लिए। (सिर्फ विपरीत लिंगी के लिए)
गुरू+ शनि- हर प्रकार के विद्वानों के बुद्घिनाश हेतु, शास्त्रार्थ व विवाद पैदा करने हेतु एवं उनमें शत्रुता पैदा करने हेतु।
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ग्रहों के मार्गी और वक्री होने पर उस समय क्या कार्य करने चाहिए..??

जानिए ग्रहों की औसत भ्रमण गति एवं मार्गी और वक्री ग्रह के बारे में---
वक्री ग्रह-----
हम आज वक्री ग्रहों के बारे में बात करेंगे....वक्री का सामान्य अर्थ उल्टा होता है व बक्री का अर्थ टेढ़ा..साधारण दृष्टि से देखें या कहें तो सूर्य,बुध आदि ग्रह धरती से कोसों दूर हैं.भ्रमणचक्र में अपने परिभ्रमण की प्रक्रिया में भ्रमणचक्र के अंडाकार होने से कभी ये ग्रह धरती से बहुत दूर चले जाते हैं तो कभी नजदीक आ जाते हैं.जब जब ग्रह पृथ्वी के अधिक निकट आ जाता है तो पृथ्वी की गति अधिक होने से वह ग्रह उलटी दिशा की और जाता महसूस होता है.उदाहरण के लिए मान लीजिये की आप एक तेज रफ़्तार कार में बैठे हैं,व आपके बगल में आप ही की जाने की दिशा में कोई साईकल से जा रहा है तो जैसे ही आप उस साईकल सवार से आगे निकलेंगे तो आपको वह यूँ दिखाई देगा मानो वो आपसे विपरीत दिशा में जा रहा है.
जबकि वास्तव में वह भी आपकी दिशा की और ही जा रहा होता है.आपकी गति अधिक होने से एक दूसरे को क्रोस करने के समय आगे आने के बावजूद वह आपको पीछे यानि की उल्टा जाता दिखाई देता है. और जाहिर रूप से आप इस प्रभाव को उसी गाडी सवार ,या साईकिल सवार के साथ महसूस कर पाते है जो आपके नजदीक होता है,दूर के किसी वाहन के साथ आप इस क्रिया को महसूस नहीं कर सकते. ज्योतिष की भाषा में इसे कहा जायेगा की साईकिल सवार आपसे वक्री हो रहा है.यही ग्रहों का पृथ्वी से वक्री होना कहलाता है.सीधे अर्थों में समझें की वक्री ग्रह पृथ्वी से अधिक निकट हो जाता है.
सामान्य परिस्थितियों में ग्रहों की औसत भ्रमण गति (एक राशि को पार करने में लगा समय) इस प्रकार है :-
सूर्य - ३० दिन (एक अंश प्रतिदिन)
चंद्र - २ दिन ६ घंटे
मंगल - ४५ दिन
बुध - २७ दिन
गुरु - १ वर्ष
शनि - २ १/२ वर्ष (३० मास)
राहु - १८ मास
केतु - १८ मास
सूर्य की रश्मियों के समीप आ जाने पर ग्रह अपनी स्वाभाविक गति को छोड़कर तीव्र गति से या अपेक्षाकृत धीमी गति से भ्रमण करने लगते हैं। ऐसा बुध के साथ अक्सर होता है। ग्रहों का इस प्रकार तीव्र गति से घूमने लगना उनका अतिचारी हो जाना कहलाता है।
यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि सूर्य और चंद्र सदैव मार्गी गति से भ्रमण करते हैं अर्थात सदैव आगे की ओर अर्थात् मेष, वृष, मिथुन इत्यादि क्रम से चलते हैं। राहु और केतु सदैव वक्री होते हैं अर्थात् सदैव पीछे की ओर अर्थात् मीन, कुम्भ, मकर, इस क्रम से चलते हैं। अन्य ग्रह स्थिति अनुसार कभी आगे कभी पीछे चलते हैं अर्थात् वे मार्गी या वक्री दोनों हो सकते हैं। वास्तव में पीछे चलने जैसी घटना नहीं होती परन्तु पृथ्वी से वे इस प्रकार चलते हुए प्रतीत होते हैं।
ग्रह के वक्री होने से उसके नैसर्गिक गुण में ,उसके व्यवहार में किसी प्रकार का कोई अंतर नहीं आता अपितु उसके प्रभाव में ,उसकी शक्ति में प्रबलता आ जाती है.देव गुरु ब्रह्स्पत्ति जिस कुंडली में वक्री हो जाते हैं वह जातक अधिक बोलने लगता है,लोगों को बिन मांगे सलाह देने लगता है.गुरु ज्ञान का कारक है,ज्ञान का ग्रह जब वक्री हो जाता है तो जातक अपनी आयु के अन्य जातकों से आगे भागने लगता है,हर समय उसका दिमाग नयी नयी बातों की और जाता है.
सीधी भाषा में कहूँ तो ऐसा जातक अपनी उम्र से पहले बड़ा हो जाता है,वह उन बातों ,उन विषयों को आज जानने का प्रयास करने लगता है,सामान्य रूप से जिन्हें उसे दो साल बाद जानना चाहिए.समझ लीजिये की एक टेलीविजन चलाने के किये उसे घर के सामान्य वाट के बदले सीधे हाई टेंसन से तार मिल जाती है.परिणाम क्या होगा?यही होगा की अधिक पावर मिलने से टेलीविजन फुंक जाएगा.इसी प्रकार गुरु का वक्री होना जातक को बार बार अपने ज्ञान का प्रदर्शन करने को उकसाता है.जानकारी ना होने के बावजूद वह हर विषय से छेड़ छाड़ करने की कोशिश करता है.अपने ऊपर उसे आवश्यकता से अधिक विश्वास होने लगता है जिस कारण वह ओवर कोंनफीडेंट अर्थात अति आत्म विश्वास का शिकार होकर पीछे रह जाता है.आपने कई जातक ऐसे देखे होंगे की जो हर जगह अपनी बात को ऊपर रखने का प्रयास करते हैं,जिन्हें अपने ज्ञान पर औरों से अधिक भरोसा होता है,जो हर बात में सदा आगे रहने का प्रयास करते हैं,ऐसे जातक वक्री गुरु से प्रभावित होते हैं.जिस आयु में गुरु का जितना प्रभाव उन्हें चाहिए वो उससे अधिक प्रभाव मिलने के कारण स्वयं को नियंत्रित नहीं कर पाते.
कई बार आपने बहुत छोटी आयु में बालक बालिकाओं को चरित्र से से भटकते हुए देखा होगा.विपरीत लिंगी की ओर उनका आकर्षण एक निश्चित आयु से पहले ही होने लगता है.कभी कारण सोचा है आपने इस बात का ?विपरीत लिंग की और आकर्षण एक सामान्य प्रक्रिया है,शरीर में होने वाले हार्मोनल परिवर्तन के बाद एक निश्चित आयु के बाद यह आकर्षण होने लगना सामान्य सी कुदरती अवस्था है.शरीर में मंगल व शुक्र रक्त,हारमोंस,सेक्स ,व आकर्षण को नियंत्रित करने वाले कहे गए हैं.इन दोनों में से किसी भी ग्रह का वक्री होना इस प्रभाव को आवश्यकता से अधिक बढ़ा देता है. यही प्रभाव जाने अनजाने उन्हें उम्र से पहले वो शारीरिक बदलाव महसूस करने को मजबूर कर देता है जो सामान्य रूप से उन्हें काफी देर बाद करना चाहिए था.
शनि महाराज हर कार्य में अपने स्वभाव के अनुसार परिणाम को देर से देने,रोक देने ,या कहें सुस्त रफ़्तार में बदल देने को मशहूर हैं.कभी आपने किसी ऐसे बच्चे को देखा है जो अपने आयु वर्ग के बच्चों से अधिक सुस्त है,जा जिस को आप हर बात में आलस करते पाते हैं.खेलने में ,शैतानियाँ करने में,धमाचौकड़ी मचाने में जिस का मन नहीं लग रहा. उसके सामान्य रिफ़लेकसन कहीं कमजोर तो नहीं हैं . जरा उस की कुंडली का अवलोकन कीजिये,कहीं उसके लग्न में शनि देव जी वक्री होकर तो विराजमान नहीं हैं.
इसी प्रकार वक्री ग्रह कुंडली में आपने भाव व अपने नैसर्गिक स्वभाव के अनुसार अलग अलग परिणाम देते हैं.अततः कुंडली की विवेचना करते समय ग्रहों की वक्रता का ध्यान देना अति आवश्यक है.अन्यथा जिस ग्रह को अनुकूल मान कर आप समस्या में नजरंदाज कर रहे हो होते हैं ,वही समस्या का वास्तविक कारण होता है,व आप उपाय दूसरे ग्रह का कर रहे होते हैं.परिणामस्वरूप समस्या का सही समाधान नहीं हो पाता..
वक्री होने से ग्रह के स्वभाव में कोई अंतर नहीं आता,बस उसकी शक्ति बढ़ जाती है.अब कुंडली के किस भाव को ग्रह की कितनी शक्ति की आवश्यकता थी व वास्तव में वह कितनी तीव्रता से उस भाव को प्रभावित कर रहा है,इस से परिणामो में अंतर आ जाता है व कुंडली का रूप व दिशा ही बदल जाती है.
इसका मतलब जब कोई ग्रह गोचर में भी वक्री हो तो उसका प्रभाव भी बढ़ जायेगा .कोयला आवंटन का जिन्न जो सरकार के लिए गले की हड्डी बन रहा है,अपनी वक्रता के बाद मार्गी होने के समयकाल में ग्रह संक्रमित हो जाता है,व अपने स्वाभाव ,नियंत्रण,प्रभाव के अनुसार अच्छे -बुरे परिणाम जल्दी से देने लगता है.

1-शनि जब मार्गी हो तो उस समय शत्रुता और शत्रुनाश के लिए समस्त कार्यों में सफलता मिलती है।
2-शनि जब वक्री हो तो दो मित्रों में एवे दो प्रेमियों में विद्वेषण एवं उच्चाटन के लिए सफलता मिलती है।
1.गुरु जब वक्री होता है तो भूमि, जायदाद व प्रतिष्ठा में न्यूनता व कमी लाने वाला कार्य कराता है।
2-इसके विपरीत जब-जब वह मार्गी होता है तो भूमि जायदाद, औहदे में बढ़ोत्तरी तथा सामाजिक प्रतिष्ठा व अन्य कार्यों में सफलता के कार्य करने हेतु किये गए तिलस्मों (यन्त्रों) में सफलता मिलती है।
1-मंगल जब मार्गी होता है तब यश, मान, पद, प्रतिष्ठा और किसी वस्तु का आयोजन- संयोजन, संगठन के लिए किये गए कार्यों में सफलता मिलती है।
2-इसके विपरीत इसके वक्री होने पर सभा, फौज को नष्ट करने के लिए विघटन सम्बन्धित सामूहिक कार्यों के लिए बचाये गए तिलस्मों (यन्त्रों) में सफलता मिलती है।
1-इसके मार्गी होने पर स्त्री-जाति में प्रेम-सम्बन्ध, मित्रता एवं ऐश्वर्यशाली वस्तुओं के क्रय-विक्रय, संयोजनात्मक कार्य, पार्टी, विवाह सगाई इत्यादि कार्यों में सफलता मिलती है।
2-इसके विक्री होने पर गर्भपात, संताननाश हेतु बनाये गए तिलस्मों (यंत्रों) में विशेषकर सफलता मिलती है।
1-बुध मार्गी होने पर यश, मान और हर प्रकार की विद्या प्राप्त करने हेतु बनाये गए तिलस्मों (यंत्रों) में सफलता मिलती है।
2-इसके विपरीत यह वक्री होने पर किसी को जलील करना, अपमानित करना व नीचा दिखाने के लिए किये गए तिलस्मों (यंत्रों) में सफलता मिलती है।
ग्रहों के मार्गी, वक्री में ठीक समय का अनुसन्धान-
1-तुला राशि के एक अंश पर किसी ग्रह के वक्री, मार्गी हो जाने पर उस समय केवल एक व्यक्ति के लिए शत्रुता या तकलीफ पहुंचाने व समाप्त करने के लिए किये गए कार्यों में सफलता मिलती है।
2-तुला राशि के दो अंशों पर किसी ग्रह के वक्री या मार्गी हो जाने पर ग्रहकाल में दुश्मन को काबू करने एवं उसको अनुकूल बनाने के लिए किये गए कार्यों में सफलता मिलती है।
3-तुला राशि के तीन अंशों पर वक्री-मार्गी हुए ग्रहकाल में ऐसे रहस्य का पता चल सकता है, जिसके बारे में जानना अत्यन्त कठिन है।
4-तुला राशि को आठ अंशों पर वक्री-मार्गी होने वाले ग्रहकाल में विपरीत लिंगी के प्रति किये गए प्रेम सम्बन्धी कार्यों व वशीकरण यंत्रों में तत्काल सफलता मिलती है।
5-तुला राशि के ग्यारह अंशों में वक्री-मार्गी हुए ग्रहकाल में विपरीत रास्ते पर गए हुए व्यक्ति को सही रास्ते पर लाने के लिए किये गए कार्यों में सफलता मिलती है।
6-तुला का शुक्र जब तेरह अंशों में वक्री अथवा मार्गी हो जाये तो किसी औरत को बदचलन करने के लिए, उसको पथभ्रष्ट करने के लिए किये गए प्रयासों में सफलता मिलती है।
7-तुला का शुक्र चौदह अंशों तक वक्री अथवा मार्गी हो जाये तो उस समय कोई भी औषधि, दवा अथवा लोशन जो सुन्दरता को बढ़ाने वाला हो, बनाया जाये तो उसमें आश्चर्यजनक सफलता मिलती है।
8-तुला का शुक्र जब तीस अंशों पर वक्री अथवा मार्गी हो तो उस समय किसी इमारत, भवन व बड़ा भवन को हमेशा-हमेशा के लिए कायम रखने के लिए उसकी कीर्ति को अखण्ड बनाने के लिए किये गए प्रयासों में सफलता मिलती है।
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आइये जाने ग्रहकृत परेशानिया /समस्याएं और उनके निवारण हेतु उपाय----
ज्योतिष, मेडिकल तथा रत्नों के विशेषज्ञों, ऋषि-मुनियों ने ग्रहों दोषों के अनेक उपाय बताए हैं, जो अनुभव में ठीक सिद्ध हुए हैं। यदि सूर्य कुप्रभाव दे रहा है तो अपने वजन के बराबर गेहूं कई रविवार को बहती नदी में बहा देना चाहिए अथवा गुड़ बहते पानी में बहा देना हितकर रहता है। सूर्य के कुप्रभाव को दूर करने के लिए बेलपत्र की जड़ गुलाबी धागे में रविवार को धारण करना लाभप्रद रहता है।
1-यदि चंद्र बुरे प्रभाव का हो तो सोमवार को चांदी का दान किया जाय। यदि यह नहीं हो पाता है तो सोमवार के दिन खिरनी की जड़ धारण की जाय।
2-मंगल मंदा हो और अच्छा फल न दे रहा हो तो मीठी रोटियां जानवरों को खिलाई जायं। मंगलवार के दिन मीठा भोजन दान किया जाय अथवा बतासा नदी में बहाया जाय या अनंतमूल की जड़ लाल डोरे में मंगलवार को धारण की जाय।
3-यदि शुक्र अशुभ फल दे रहा हो तो गाय का दान अथवा पशु आहार का दान किया जाय, पशु आहार को नदी में बहाया जाय या सरपोंखा की जड़ सफेद धागे में शुक्रवार को धारण किया जाय।
4-यदि बुध मंदा है तो साबूत मूंग बुधवार को नदी या बहते पानी में बहाई जाय अथवा विधारा की जड़ हरे धागे में बुधवार को धारण किया जाय।
5-यदि बृहस्पति ग्रह कुफल दे रहा है तो गुरुवार को केसर नाभि या जिह्वा पर लगाई जाय अथवा केसर का भोजन में सेवन करें अथवा नारंगी या केले की जड़ पीले धागे में गुरुवार को धारण की जाय।
6-यदि शनि ग्रह बुरा है तो काले उड़द को शनिवार को नदी में बहाया जाय या शनिवार को तेल का दान किया जाय। शनिवार के दिन बिच्छू की जड़ काले धागे में धारण करने से शनिकृत दोष समाप्त होता है।
7-यदि राहु मंदा है और दोषयुक्त है तो बृहस्पतिवार को मूलियों का दान करें अथवा कच्चे कोयले को शनिवार के दिन नदी में प्रवाहित करें या सफेद चंदन नीले डोरे में बुधवार को धारण करें।
8-केतु ग्रह के प्रतिकूल होने पर कुत्ते को रोटी दी जाय अथवा अश्वगन्धा की जड़ आसमानी रंग के धागे में गुरुवार को धारण की जाय।
9-सर्वसमृद्धि के लिए कौवे, गाय, कुत्ते को अपने आहार में से प्रतिदिन हिस्सा दिया जाय। खाना खाने के समय अपने आहार में कुछ भाग इन तीनों को आहार के लिए अवश्य देना चाहिए।
10-विवाह ठीक समय पर हो, रुकावटें न आएं, इसके लिए यदि स्त्री जातक है तो मूंगा धारण करे, पुरुष जातक है तो मोती या चंद्रमणि धारण करे अथवा छुहारे को शुक्रवार की रात में उबालकर रखें और शनिवार को प्रात:काल नदी में बहा दें। इस तरह आठ शनिवार किया जाय।
11-किसी भी प्रकार की परीक्षा उत्तीर्ण करने के लिए पन्ना, मूंगा या पुखराज धारण किया जाय।
12-व्यापार में सफलता के लिए लहसनिया, पीला पुखराज या पन्ना धारण किया जाय।
13-नौकरी में तरक्की के लिए पुखराज या पन्ना धारण किया जाय और प्रात: सूर्य को नमस्कार किया जाय।
14-एक्सीडेंट से बचने के लिए मूंगा या मून स्टोन अथवा मूंगा और पुखराज धारण किया जाय।
15-रात्रि को नींद न आती तो बिना जोड़ वाली स्टील की अंगूठी धारण की जाय अथवा चंदमणि धारण करें।
16-ब्लड प्रेसर के लिए पन्ना सोने की अंगूठी में धारण करें या पुखराज पांच रत्ती का सोने की अंगूठी में बीच वाली अंगुली में धारण करें या पुखराज पांच रत्ती का सोने की अंगूठी में तर्जनी में धारण करें।
17-शुगर के लिए हीरा एक रत्ती सोने में बीच वाली अंगुली में अथवा सात रत्ती सफेद मूंगा और पीला पुखराज 5 रत्ती बीच वाली अंगुली में धारण करें।
18-दमा के लिए मूंगा छह रत्ती और मून स्टोन पांच रत्ती बीच वाली अंगुली में धारण करें तथा पीला पुखराज चार रत्ती तर्जनी में धारण करें। यह दाहिने हाथ में ही पहना जाय।
19-सिरदर्द के लिए छह रत्ती पन्ना सोने में दाहिने हाथ की मध्यमा अंगुली में धारण करें।
20-दांत में दर्द या वदन दर्द के लिए स्टील की अंगूठी दाहिने हाथ की तर्जनी में धारण करें।

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