जगन्नाथ रथयात्रा ( 23 से 29 जून,2014 तक) महोत्सव : ---एक नजर में---

जगन्नाथ रथयात्रा ( 23 से 29 जून,2014 तक) महोत्सव : ---एक नजर में---




श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र जगन्नाथ रथयात्रा महोत्सव 23 से 29 जून,2014 तक----

भारत भर में मनाए जाने वाले महोत्सवों में जगन्नाथपुरी की रथयात्रा सबसे महत्वपूर्ण है। यह परंपरागत रथयात्रा न सिर्फ हिन्दुस्तान, बल्कि विदेशी श्रद्धालुओं के भी आकर्षण का केंद्र है। श्रीकृष्ण के अवतार जगन्नाथ की रथयात्रा का पुण्य सौ यज्ञों के बराबर माना गया है। 

इस वर्ष रथयात्रा महोत्सव 23 से 29 जून,2014 तक मनाया जाएगा। 

रथयात्रा का शुभारंभ सोमवार को होना है। आषाढ़ शुक्ल द्वितिया को संपूर्ण भारतवर्ष में रथयात्रा-उत्सव धूमधाम से मनाया जाता है। सबसे अधिक प्रतिष्ठित समारोह जगन्नाथ पुरी में मनाया जाता है। इस उत्सव का देश ही नहीं विदेशों में भी धूमधाम से आयोजन होता है। बंगाल की खाड़ी के निकट बसा यह पवित्र स्थान उड़ीसा की राजधानी भुवनेश्वर से आठ किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। प्राचीन काल में पुरी को पुरुषोत्तम क्षेत्र एवं श्रीक्षेत्र भी कहा जाता था। पुरी में यात्रा प्रारंभ होने के एक दिन पूर्व रविवार को नवयौवन दर्शन के मौके पर लाखों भक्त भगवान के दर्शन करते थे। नव यौवन दर्शन को नेत्रोत्सव के नाम से भी जाना जाता है। 

यह एक बड़ा समारोह है, जिसमें भारत के विभिन्न भागों से श्रद्धालु आकर सहभागी बनते हैं। दस दिन तक मनाए जाने वाले इस पर्व/ यात्रा को 'गुण्डीय यात्रा' भी कहा जाता है। 

पिछले नौ सौ वर्ष से आयोजित होने वाली जगन्नाथपुरी रथ यात्रा की तैयारियां पूरी हो चुकी हैं।
भगवान जगन्नाथ, बलभद्र व देवी सुभद्रा के पंद्रह दिन के एकांतवास समाप्त होने की याद में इसे मनाया जाता है। मान्यता है कि पन्द्रह दिन की बीमारी के बाद भगवान जगन्नाथ स्वस्थ होकर श्रध्दालुओं को दर्शन देते हैं, जिसे नेत्रोत्सव के रूप में जाना जाता है। उसके अगले दिन भगवान अपनी मौसी के घर नौ दिन के प्रवास के लिए रवाना होते हैं। 

माना जाता है कि इस रथयात्रा में सहयोग से मोक्ष प्राप्त होता है, अत: सभी कुछ पल के लिए रथ खींचने को आतुर रहते हैं। जगन्नाथ जी की यह रथयात्रा गुंडीचा मंदिर पहुंचकर संपन्न होती है। जगन्नाथपुरी का वर्णन स्कंद पुराण, नारद पुराण, पद्म पुराण और ब्रह्म पुराण में मिलता है।

पुरी का जगन्नाथ मंदिर भक्तों की आस्था केंद्र है, जहां वर्षभर श्रद्धालुओं की भीड़ लगी रहती है। जो अपनी बेहतरीन नक्काशी व भव्यता लिए प्रसिद्ध है। यहां रथोत्सव के वक्त इसकी छटा निराली होती है, जहां प्रभु जगन्नाथ को अपनी जन्मभूमि, बहन सुभद्रा को मायके का मोह यहां खींच लाता है। रथयात्रा के दौरान भक्तों को सीधे प्रतिमाओं तक पहुंचने का मौका भी मिलता है।

यह दस दिवसीय महोत्सव होता है। इस दस दिवसीय महोत्सव की तैयारी का श्रीगणेश अक्षय तृतीया को श्रीकृष्ण, बलराम और सुभद्रा के रथों के निर्माण से होता है और कुछ धार्मिक अनुष्ठान भी महीने भर किए जाते हैं। 

=== भगवान जगन्नाथजी का रथ 'गरुड़ध्वज' या 'कपिलध्वज' कहलाता है। 16 पहियों वाला रथ 13.5 मीटर ऊंचा होता है जिसमें लाल व पीले रंग के कप़ड़े का इस्तेमाल होता है। विष्णु का वाहक गरुड़ इसकी हिफाजत करता है। रथ पर जो ध्वज है, उसे 'त्रैलोक्यमोहिनी' कहते हैं।

===बलराम का रथ 'तलध्वज' के बतौर पहचाना जाता है, जो 13.2 मीटर ऊंचा 14 पहियों का होता है। यह लाल, हरे रंग के कपड़े व लकड़ी के 763 टुकड़ों से बना होता है। रथ के रक्षक वासुदेव और सारथी मताली होते हैं। रथ के ध्वज को उनानी कहते हैं। त्रिब्रा, घोरा, दीर्घशर्मा व स्वर्णनावा इसके अश्व हैं। जिस रस्से से रथ खींचा जाता है, वह बासुकी कहलाता है।

==='पद्मध्वज' यानी सुभद्रा का रथ। 12.9 मीटर ऊंचे 12 पहिए के इस रथ में लाल, काले कपड़े के साथ लकड़ी के 593 टुकड़ों का इस्तेमाल होता है। रथ की रक्षक जयदुर्गा व सारथी अर्जुन होते हैं। रथध्वज नदंबिक कहलाता है। रोचिक, मोचिक, जिता व अपराजिता इसके अश्व होते हैं। इसे खींचने वाली रस्सी को स्वर्णचुडा कहते हैं। 

===मंदिर से जुड़ी कथाएं ---

इस मंदिर के उद्गम से जुड़ी परंपरागत कथा के अनुसार, भगवान जगन्नाथ की इंद्रनील या नीलमणि से निर्मित मूल मूर्ति, एक अंजीर वृक्ष के नीचे मिली थी। यह इतनी चकचौंध करने वाली थी, कि धर्म ने इसे पृथ्वी के नीचे छुपाना चाहा। मालवा नरेश इंद्रद्युम्न को स्वप्न में यही मूर्ति दिखाई दी थी। तब उसने कड़ी तपस्या की, और तब भगवान विष्णु ने उसे बताया कि वह पुरी के समुद्र तट पर जाए, और उसे एक दारु (लकड़ी) का लठ्ठा मिलेगा। 
उसी लकड़ी से वह मूर्ति का निर्माण कराए। राजा ने ऐसा ही किया, और उसे लकड़ी का लठ्ठा मिल भी गया। उसके बाद राजा को विष्णु और विश्वकर्मा बढ़ई कारीगर और मूर्तिकार के रूप में उसके सामने उपस्थित हुए। किंतु उन्होंने यह शर्त रखी, कि वे एक माह में मूर्ति तैयार कर देंगे, परन्तु तब तक वह एक कमरे में बंद रहेंगे, और राजा या कोई भी उस कमरे के अंदर नहीं आए। माह के अंतिम दिन जब कई दिनों तक कोई भी आवाज नहीं आई तो उत्सुकता वश राजा ने कमरे में झांका, और वह वृध्द कारीगर द्वार खोलकर बाहर आ गया, और राजा से कहा, कि मूर्तियां अभी अपूर्ण हैं, उनके हाथ अभी नहीं बने थे। 
राजा के अफसोस करने पर, मूर्तिकार ने बताया, कि यह सब दैववश हुआ है, और यह मूर्तियां ऐसे ही स्थापित होकर पूजी जाएंगी। तब वही तीनों जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की मूर्तियां मंदिर में स्थापित की गईं।

===मंदिर का आकर्षण---

 ऐसी धारणा है कि कभी यहां भगवान बुध्द का दांत गिरा था, इसलिए इसे दंतपुर भी कहा जाता था। यहां का जगन्नाथ मंदिर अपनी भव्य एवं ऐतिहासिक रथयात्रा के लिए पूरे संसार में प्रसिद्ध है। पश्चिमी समुद्र तट से लगभग डेढ़ किलोमीटर दूर उत्तर में नीलगिरी पर्वत पर 665 फुट लंबे और इतने ही चौड़े घेरे में 22 फुट ऊंची दीवारों के मध्य स्थित यह प्राचीन एवं ऐतिहासिक मंदिर कलिंग वास्तुशैली में बना 12वीं सदी का सबसे उत्कृष्ट उदाहरण है। कृष्णवर्णी पाषाणों को तराशकर बनाए गए इस मंदिर का निर्माण 12वीं सदी के नरेश चोड़गंग ने करवाया था।

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